बहुत चर्चा होती है आजकल हिन्दी में हो रही तकनीकी प्रगति की, खासतौर पर आईटी में। इस नाचीज ने सुझाव दिया था कि हम अमरीका के ह्रदय में सम्मेलन कर रहे हैं। हमें भारत में आ चुकी और आने की इच्छा रखने वाली हर बडी आईटी कंपनी को निमंत्रित करना चाहिए सम्मेलन में शामिल होने और हिन्दी के प्रतिनिधि जगत को यह बताने के लिए कि वे हिन्दी, दूसरी भारतीय भाषाओं और संसार की दूसरी भाषाओं में, उनके लिए क्या कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं। हिन्दी को यह जानने की जरूरत है कि जापानी,.रूसी, फ्रेंच, चीनी, कोरियाई, अरबी, स्पैनिश आदि पर वैश्वीकरण का क्या असर पड रहा है। वे अंग्रेजी के बढते प्रभाव और प्रसार को कैसे देखती हैं, किन रणनीतियों को अपना रही हैं? इन भाषाओं में तकनीकी विकास की दशा और दिशा क्या है? उनकी सरकारें उनके लिए क्या कर रही है? गैर-सरकारी स्तर पर क्या हो रहा है? क्या हिन्दी उसके अनुभव से कुछ सीख सकती है? इस कंपनियों की इन प्रक्रियाओं में क्या भूमिका है?
राहुल देव की टिप्पणी के कुछ अंश ही हम यहाँ दे पाए. यह पूरी टिप्पणी आप www.samyakbharat.blogspot.com पर देख सकते हैं.)

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