इस आलेख के माध्यम से यह स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि राष्ट्रवाद और भाषा अविभाज्य रूप से जुडे हैं। किसी भी राष्ट्र में, राष्ट्रवाद के विकास के साथ उस राष्ट्र की भाषा या भाषाओं की उन्नति होती है, और राष्ट्रवाद की भावना के क्षरण के साथ उसकी भाषाओं की अवनति। आज भारत में हिन्दी ही नहीं, अपितु अन्य सब राष्ट्रीय भाषाओं, जैसे तमिल, तेलगू, बंगाली आदि भाषाओं का अवमूल्यन हुआ ह। उसका मुख्य कारण ह देश में राष्ट्रवाद का क्षरण।
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(टिप्पणी के कुछ अंश ही हम यहाँ दे पाए. यह पूरी टिप्पणी आप http://www.lakesparadise.com/madhumati/show_artical.php?id=379 पर देख सकते हैं.)

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