जब तक मनुष्य की सोच नहीं बदलेगी तब तक कुछ नया नहीं हो पाएगा। यूरोप के एक विद्वान ने कहा है कि यदि आप 21वीं सदी में कुछ नया करना चाहते हैं तो आपको पहले अपनी सोच बदलनी होगी। दुर्भाग्य से हमारे देश के अन्दर सभी वर्गों की सोच विकृत हो गई है। किसान की सोच का रास्ता बिगड़ गया है। उद्योगपतियों की सोच का रास्ता, पढ़ने वाले छात्रेंकी सोच का रास्ता बिगड़ गया है। आजकल देश मे राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए होनहार विद्यार्थी आगे नहीं आते हैं। जहां इन विषयों की पढ़ाई होती है, लोग उसे बेकार विद्यार्थियों का कालेज मान लेते हैं। ऐसा ही रहा तो देश में बेसिक साइंस के जानकार नहीं रह जाएंगे और देश में कंगाली छा जाएगी। क्यों? सभी लोग साफ्रटवेयर इंजीनीयिर बनने में लगे हैं। इसका बहुत भयानक परिणाम होगा। इस विकृति से निपटने के लिए समाज के सभी क्षेत्रेंमें हमें एक नई सोच के साथ काम करना होगा। विद्यार्थी की सोच को हमें एक नई उंचाई देनी होगी। छात्रेंको यह सोचना चाहिए कि क्या मैं सुभाष चंद्र बोस के रिकार्ड को तोड़ सकता हूं? क्या मैं विवेकानंद का रिकार्ड तोड़ सकता हूं?
.....(टिप्पणी के कुछ अंश ही हम यहाँ दे पाए. यह पूरी टिप्पणी आप http://www.bhartiyapaksha.com/mag-issues/2008/February08/hame%20Apni%20Soch%20or.html पर देख सकते हैं.)

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