देश के संविधान ने हिन्दी को भारतीय संघ की राजभाषा घोषित किया। हिन्दी को उसका स्थान मिले, इसके लिए समय-समय पर कई महत्वपूर्ण नियम भी बने, लेकिन हिन्दी को उसका वह अधिकार, वह प्रतिष्ठा नहीं मिली जो उसे मिलनी चाहिए थी। जहां प्रजा की भाषा को ही उसका स्थान न मिला हो, वहां प्रजातन्त्र एक ढकोसले से अधिाक कुछ नहीं हो सकता। देश में सच्चे अर्थों में प्रजातन्त्र स्थापित हो, इसके लिए प्रजा की भाषा को उसका स्थान, उसका अधिाकार मिलना बेहद आवश्यक है। अपने अधिाकारों की लड़ाई लड़ने में सबसे बड़ा हथियार अपनी भाषा ही है। आज देश में कई व्यक्ति एवं संस्थान हिन्दी के प्रतिष्ठापन के लिए जी जान से लगे हुए हैं। ऐसा ही एक संगठन है, 'राजभाषा संघर्ष समिति, दिल्ली'। प्रदर्शनात्मक व खर्चीले कार्यव्रफमों से बचते हुए, रचनात्मक कार्यव्रफमों को हाथ में लेकर उनका उत्कृष्ट कृरीति से क्रियान्वयन ही राजभाषा संघर्ष समिति की कार्य प्रणाली है। इस संगठन से जुड़े लोगों के लिए हिन्दी केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं है, यह उनके लिए देश की अस्मिता की लड़ाई है।
............(टिप्पणी के कुछ अंश ही हम यहाँ दे पाए. यह पूरी टिप्पणी आप http://www.bhartiyapaksha.com/mag-issues/2008/January08/Rajbasa%20Ke%20Samman%20ke.html पर देख सकते हैं.)

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