हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़े पर औपचारिक फातिहे पढ़कर रस्मअदायगी की जाती रही है पर समस्या के मूल तक जाने में न किसी की दिलचस्पी है, न इसकी ज़रूरत समझी जाती है। ऐसे शुष्क और नीरस माहौल में, जहाँ हिंदी दिवस के नाम पर कई कार्यालयों में हिंदी में चुटकुला प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं, हिंदी के पाठ्यक्रम में बदलाव/संशोधन की चर्चा हिंदी के तथाकथित शुभचिंतकों के रेगिस्तान में पानी की लकीर के दिखने-सी राहत पहुँचाने जैसा ही है!......................(टिप्पणी के कुछ अंश ही हम यहाँ दे पाए. यह पूरी टिप्पणी आप http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/hindi_diwas/rajbhasha.htm पर देख सकते हैं.)

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